कविता : ऐ हवा कभी तो मेरे दर से गुज़र
सोमवार, 7 दिसंबर 2009कभी समंदर किनारे नर्म, ठंडी रेत पर बैठे हुए डूबते हुए सूरज को निहारना ....... और फ़िर यूँ लगे कि मन भी उसी के साथ हो लिया हो। इस दुनिया की उथल-पुथल से दूर, बहुत दूर और पा लेना कुछ सुकून भरे लम्हें ....... किसी पहाड़ी की चोटी पर बने मन्दिर की सीढियां पैदल चढ़कर जाना और दर्शनोपरांत उन्हीं सीढ़ियों पर कुछ देर बैठकर वादी की खूबसूरती को आंखों से पी जाना। बयाँ करते-करते थक जाना मगर चुप होने का नाम न लेना। मगर इन सबके बीच जब तन्हाई आकर डस जाए तो कुछ दर्द के साए उमड़ने लगते हैं और ना चाहते हुए भी ख़्वाबों-ख्यालों का ताना-बाना कुछ इस तरह सामने आता है
ऐ हवा कभी तो मेरे दर से गुजर,
देख कितनी महकी यादें संभाली हैं मैंने,
संग तेरे कर जाने को,
हवा हो जाने को।
ऐ बहार कभी तो इधर भी रुख कर,
देख कई गुलाब मैंने भी रखे थे कभी,
किताबों में मुरझाने को,
पत्ता-पत्ता हो जाने को।
ऐ चाँद थोड़ी चाँदनी की इनायत कर,
कई छाले मैंने भी सजा कर रखे हैं,
बेजान बदन तड़पाने को,
रूह का दर्द छिपाने को।
ऐ चिराग घर में कुछ तो रोशनी कर,
कई बार आशियाँ जलाया है मैंने,
उजाला पास बुलाने को,
अँधेरा दूर भगाने को।
ऐ शाम ना जा, ज़रा कुछ देर ठहर,
अक्सर रात को पाया है मैंने,
तन्हाई मेरी मिटाने को,
दोस्त कोई कहलाने को।
ज़िन्दगी एक आलू का परांठा है
मंगलवार, 1 दिसंबर 2009अरे रे....... ये क्या, शीर्षक पढ़कर चौंकिए मत। ज़िन्दगी सिर्फ़ एक आलू का परांठा नहीं है, आलू चाहे जितने मर्ज़ी हों पर ज़िन्दगी एक परांठा है, इतना समझ लीजिये। हमने कह दिया तो कह दिया बस। ज़िन्दगी के फ़लसफ़े को भला कौन जान पाया है आज तक....... यूँ तो बहुतों ने कहा और क्या ख़ूब कहा मगर जनाब अब हमारी बारी है। जब भी ज़िन्दगी क्या है, इसके बारे में सोचता हूँ तो आनंद फ़िल्म में समुन्दर के किनारे "ज़िन्दगी कैसी है पहेली हाए" गुनगुनाते हुए राजेश खन्ना साहब याद आते हैं....... सामने फ़िल्म चलने लगती है। अब जब मूड बन ही गया है तो इसी बात पर कुछ हमारी तरफ़ से भी नोश फरमाएं.......
ज़िन्दगी एक आलू का परांठा है,
जो वक्त के तवे पर सेका जाता है,
ठीक पके तो स्वाद है भैया,
वरना कच्चा भी रह जाता है।
ज़िन्दगी एक भरा हुआ पैमाना है,
आहिस्ते-आहिस्ते पिया जाता है,
पर होश भी रखना होता है,
वरना जाम छलक ये जाता है।
ज़िन्दगी एक थैली नमक है,
जो चुटकी से डाला जाता है,
ठीक पड़े तो ज़ायका,नहीं तो,
कम-ज्यादा हो जाता है।
ज़िन्दगी एक गर्म कम्बल है,
जो जाड़ों में सबको भाता है,
और गर्मी के आ जाने पर,
बंद सन्दूक में ही सुहाता है।
जिंदगी एक चाय की दुकान है,
जहाँ हर कोई आता जाता है,
कुछ कहता है कुछ सुनता है,
फिर अपनी राह को जाता है।
चलते-चलते आपको याद दिला दूँ कि आज विश्व एड्स दिवस (World AIDS Day) है और एड्स एक लाइलाज बीमारी है, इससे बचकर रहिये, जागरूकता फैलाइये। याद रखिये, एड्स पीड़ित व्यक्तियों को भी सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ जीने का पूरा हक है। एड्स-जागरूकता पर आधारित एक रेडियो कार्यक्रम सुना था काफ़ी पहले, वहीं से ये चार पंक्तियाँ पेश हैं:
सफर ये ज़िन्दगी का सुहाना बहुत है,
नशे में मगर ये ज़माना बहुत है,
अब भी वक्त है संभल जाओ यारों,
बरबादियों का वरना खज़ाना बहुत है।


