ज़िन्दगी एक आलू का परांठा है

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

अरे रे....... ये क्या, शीर्षक पढ़कर चौंकिए मत। ज़िन्दगी सिर्फ़ एक आलू का परांठा नहीं है, आलू चाहे जितने मर्ज़ी हों पर ज़िन्दगी एक परांठा है, इतना समझ लीजिये। हमने कह दिया तो कह दिया बस। ज़िन्दगी के फ़लसफ़े को भला कौन जान पाया है आज तक....... यूँ तो बहुतों ने कहा और क्या ख़ूब कहा मगर जनाब अब हमारी बारी है। जब भी ज़िन्दगी क्या है, इसके बारे में सोचता हूँ तो आनंद फ़िल्म में समुन्दर के किनारे "ज़िन्दगी कैसी है पहेली हाए" गुनगुनाते हुए राजेश खन्ना साहब याद आते हैं....... सामने फ़िल्म चलने लगती है। अब जब मूड बन ही गया है तो इसी बात पर कुछ हमारी तरफ़ से भी नोश फरमाएं.......

ज़िन्दगी एक आलू का परांठा है,
जो वक्त के तवे पर सेका जाता है,
ठीक पके तो स्वाद है भैया,
वरना कच्चा भी रह जाता है।

ज़िन्दगी एक भरा हुआ पैमाना है,
आहिस्ते-आहिस्ते पिया जाता है,
पर होश भी रखना होता है,
वरना जाम छलक ये जाता है।

ज़िन्दगी एक थैली नमक है,
जो चुटकी से डाला जाता है,
ठीक पड़े तो ज़ायका,नहीं तो,
कम-ज्यादा हो जाता है।

ज़िन्दगी एक गर्म कम्बल है,
जो जाड़ों में सबको भाता है,
और गर्मी के आ जाने पर,
बंद सन्दूक में ही सुहाता है।

जिंदगी एक चाय की दुकान है,
जहाँ हर कोई आता जाता है,
कुछ कहता है कुछ सुनता है,
फिर अपनी राह को जाता है।

चलते-चलते आपको याद दिला दूँ कि आज विश्व एड्स दिवस (World AIDS Day) है और एड्स एक लाइलाज बीमारी है, इससे बचकर रहिये, जागरूकता फैलाइये। याद रखिये, एड्स पीड़ित व्यक्तियों को भी सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ जीने का पूरा हक है। एड्स-जागरूकता पर आधारित एक रेडियो कार्यक्रम सुना था काफ़ी पहले, वहीं से ये चार पंक्तियाँ पेश हैं:

सफर ये ज़िन्दगी का सुहाना बहुत है,
नशे में मगर ये ज़माना बहुत है,
अब भी वक्त है संभल जाओ यारों,
बरबादियों का वरना खज़ाना बहुत है।


11 टिप्पणियाँ
Udan Tashtari ने कहा…

सफर ये ज़िन्दगी का सुहाना बहुत है,
नशे में मगर ये ज़माना बहुत है,
अब भी वक्त है संभल जाओ यारों,
बरबादियों का वरना खज़ाना बहुत है।


-सही फलसफा सुना हुआ है/// वाह!

शरद कोकास ने कहा…

अभी आलू का पराठा खाया है सुबह सुबह और इस फलसफे के बारे मे पढ़ रहा हूँ।

निर्मला कपिला ने कहा…

ज़िन्दगी एक आलू का परांठा है,
जो वक्त के तवे पर सेका जाता है,
ठीक पके तो स्वाद है भैया,
वरना कच्चा भी रह जाता है
वाह् ज़िन्दगी के लिये ये नई उपमायें अच्छी लगी

सफर ये ज़िन्दगी का सुहाना बहुत है,
नशे में मगर ये ज़माना बहुत है,
अब भी वक्त है संभल जाओ यारों,
बरबादियों का वरना खज़ाना बहुत है।
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है बधाई

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत खूब .आलू का परांठा और ज़िन्दगी सही रही यह तुलना भी ..नया अंदाज़ है

चंदन कुमार झा ने कहा…

भई बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना । बधाई

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर लगा आप का यह पारंठा, ओर स्वादिष्ट भी. धन्यवाद

अनूप शुक्ल ने कहा…

बढ़िया सिका है पराठा।

Peeyush Yadav ने कहा…

"ज़िन्दगी एक आलू का परांठा है" क्या बात है प्रशांत ... मज़ा आ गया. आपका ये पराठा और लोगों को भी खिलाता हूँ..

woyaadein ने कहा…

आप सभी महानुभावों का बहुत-बहुत शुक्रिया जो आपने इस नाचीज़ के परांठे को बड़े ही चाव से ग्रहण किया, वरना सेकते समय तो मन में एक ही डर था कि परांठा कहीं कच्चा ना निकले. पर अब सब चिंता दूर हुई. चलिए ये परांठा-संवाद भी खूब रहा. अगर और कोई सज्जन भी इस परांठे का स्वाद चखना चाहे तो हमारी दुकान हमेशा खुली है.......:-)

साभार
प्रशान्त कुमार (काव्यांश)
हमसफ़र यादों का.......Humsafar Yaadon Ka

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