मित्र दिवस : लघुकथा

रविवार, 2 अगस्त 2009

क्या हुआ आज ?? मिली कोई जॉब...?? कमरे में लेटे हुए सुशांत ने गौरव से आते ही पूछा......नहीं यार.....उन्हें सिर्फ़ एक्सपीरियंस वाले बन्दे चाहिए.....नो फ्रेशर्स.....गौरव ने लटके हुए चेहरे के साथ जवाब दिया और सिगरेट जलाने लगा......अब क्या करें यार मार्केट का बहुत बुरा हाल है......और इन कंपनियों की चालबाजी ऊपर से.....रिसेशन के नाम का अच्छा इस्तेमाल कर रही हैं.....पर तू हिम्मत मत हार.....ट्राई करता रह.....और हो सके तो यार ये सिगरेट छोड़ दे, तुझे मैंने कितनी बार कहा है कि मुझे सिगरेट और सिगरेट पीने वालों से कितनी नफ़रत है, सिगरेट का धुंआ मेरे से बर्दाश्त नहीं होता....गौरव की सिगरेट की लत से सुशांत बहुत परेशान था.....और हो भी क्यों न, चार साल से साथ रह रहे दोस्त को उसने कभी कोई नशा करते नहीं देखा था, मगर अचानक से जॉब ढूंढते-ढूंढते उसका हौंसला ऐसा टूटा कि न जाने कब वो इस नशे की गिरफ्त में आ गया, उसे ख़ुद पता नहीं चला......

सुशांत जानता था कि गौरव का आत्मविश्वास थोड़ा सा डगमगा गया है जिसके कारण वो मायूसी और सिगरेट का शिकार हो रखा है। अगर किसी तरह उसका ये आत्मविश्वास वापस लौट आए तो कुछ बात बने.....मगर कैसे?? उसके सामने यही एक सवाल मुंह बाए खड़ा था। यही सोचते-सोचते सुशांत बीते दिनों की यादों में खो गया......किस तरह एडमिशन के टाइम पे वो गौरव से पहली बार मिला था, मगर जब कॉलेज में गौरव उसके सामने आया तो वो उसे पहचान ही नहीं पाया था। जब गौरव बोला यार हम लोगों ने एडमिशन एक साथ लिया था, तब कहीं जाकर उसे कुछ धुंधला सा याद आया था। पता नहीं कितनी यादें, बातें और किस्से जो दोनों ने साथ में जिये थे। और फ़िर याद आया उसे अपना वो वक़्त जब वो पूरी तरह से टूट चुका था......फर्स्ट सेमेस्टर के एक्जाम्स में चारों सब्जेक्ट में फेल होने के बाद तो उसे अपना कोई भविष्य ही नहीं दिख रहा था। घोर निराशा के जाल में फंसकर रह गया था। तभी गौरव की आवाज़ से उसका ध्यान टूटा, खाना नहीं खाना है क्या आज..........?? हाँ, खाना तो है, चलो चलें।

खाना खाकर दोनों बैड पर लेट गए......कमरे में मद्धम रौशनी थी.....सुशांत ने कहा आज मनोहर का फ़ोन आया था.....अच्छा, क्या बोल रहा था, हुई उसकी ऍम बी ए क्लासेस स्टार्ट....हाँ, तो क्लासेस तो चालू हैं.....चलो यार वो तो अच्छी जगह पहुँच गया, अपना पता नहीं क्या होगा, गौरव ने आह भरते हुए कहा। हो जाएगा यार, तू बस टेंशन मत ले, वैसे अपने कॉलेज के दिन भी कितने मस्त थे ना.....सारे दोस्त बहुत याद आते हैं। क्या लाइफ थी यार.....बस मस्ती ही मस्ती......कॉलेज के पहले-पहले दिनों में रैगिंग का खौफ़......फ़िर फ्रेशर्स पार्टी और सीनियर्स से दोस्ती.....कॉलेज की बातें सुनकर गौरव के चेहरे पर आई हल्की सी चमक सुशांत से छिपी नहीं थी। कितने दिनों बाद उसने उसके चेहरे पर खुशी देखी थी। ख़ैर अब गौरव की बारी थी। वह बोल पड़ा......हाँ यार, क्या दिन थे.....क्लासेस बंक करना, सारे सेमेस्टर मस्ती और फ़िर पेपर्स के टाइम मार्क्स के लिए ज़द्दोज़हद, रातों को जागना, मैगी पकाना......फुल्टू ऐश मगर रिजल्ट और मार्क्स से नो कोम्प्रोमाईज....

अच्छा गौरव, तुझे मेरा सुसाइड के बारे में सोचने वाला सीन याद है,सुशांत ने कहा......हाँ यार, तेरी वो नादानी कैसे भूल सकता हूँ......फर्स्ट सेमेस्टर तेरा लटक गया था तो तू देवदास बन गया था। ना किसी से बात करना, ना कॉलेज जाना, बस गुमसुम रहना.....हमनें कितनी बार तुझे समझाने की कोशिश की, कितनी कड़वी बातें कहीं तब कहीं जाकर तू माना.....मैं भी अब उस बारे में सोचता हूँ तो अपनी बेवकूफी पर हँसी आती है, सुशांत बोला......ना ही फेल होने से ज़िन्दगी खतम हो जाती है, और ना ही जॉब ना मिलने से......क्यूँ गौरव मैं ठीक बोल रहा हूँ न.....गौरव कुछ बोल न सका। सुशांत ने आगे कहा, मुझे तेरी दोस्ती पर नाज़ है, अगर उस वक्त तू ना होता तो मैं तो काम से गया था। तेरी दोस्ती ने मुझे जीना सिखाया है दोस्त। याद है मुझे वो थप्पड़ जो तूने सुसाइड की बात पर मारा था। मगर मुझे अपने आप पर शर्म आ रही है जो मेरे होते हुए भी तू इस सिगरेट, नशे और मायूसी में डूबा है। मैं तुझे इस हाल में नहीं देख सकता दोस्त, इससे अच्छा तो मैं मर ही जाता।

सुशांत के ये शब्द सुनकर गौरव चिल्लाया.......ख़बरदार जो मरने की बात की तो, एक थप्पड़ और मारूंगा......घूमेगा फ़िर लाल-लाल मुंह लेकर.......इतना कहकर गौरव सुशांत के गले लग गया और फ़िर उन दोनों की आंखों से निकले आंसुओं ने सारे अवसाद बहा डाले.....गौरव सुबकते हुए बोला मुझे माफ़ कर दे यार, मैं भटक गया था लेकिन आज तूने मुझे सही रास्ता दिखा दिया है, मेरी आँखें खुल गई हैं। आज से ये मायूसी भरी बातें और ये सिगरेट बंद और इतना कहकर उसने सिगरेट का पैकेट खिड़की से बाहर फेंक दिया। सुशांत के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी आख़िर उसका खोया हुआ दोस्त फ़िर से मिल गया था।

अंत में,
आप सभी को मित्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें.........


13 टिप्पणियाँ
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बढ़िया पोस्ट लगाई है।

दोस्ती का जज़्बा सलामत रहे।
मित्रता दिवस पर शुभकामनाएँ।

Chandan Kumar Jha ने कहा…

बहुत अच्छी लघुकथा.....आपको मित्रता दिवस की शुभकामनायें.

Desk Of Kunwar Aayesnteen @ Spirtuality ने कहा…

mitrata diwas pe behtarin rachna....Badhai ho....

Ria Sharma ने कहा…

Mitrata divas par achcha lekh ..motivating !!

pratima sinha ने कहा…

dear prashaant ji, aapka dil chhoone wala blog pada, achchha laga. mai abhi-abhi aap sabke saath is haseen duniya me shamil huyi hoo,ummeed hai, aap sab se jud sakugi.ishwar aapki lekhani ko lambi umar de.....

pratima sinha from MERA AKASH....

buddhaofsuburbia ने कहा…

सुशांत शराब बहुत पीता है ....उससे कहो शराब छोड़ दे.

vijay kumar sappatti ने कहा…

bahut aachi post hai bhai .. dosti sabse badi niyamat hai ... badhai

vijay

pls read my new poem "झील" on my poem blog " http://poemsofvijay.blogspot.com

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

Mitra diwas ko is laghukatha dwara aapne bkhoobi samjhaya hai ......!!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

DOSTI SE BADH KAR KUCH BHI NAHI.......AGAR DONO TARAF SE HO

Daisy ने कहा…

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PurpleMirchi ने कहा…

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PurpleMirchi ने कहा…

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