हम सब मजदूर हैं

शनिवार, 2 मई 2009

हिन्दी ब्लॉग लेखन की दुनिया में प्रवेश का यह पहला हफ्ता काफी व्यस्त और रोमांचक रहा। एक ओर जहाँ अच्छे-अच्छे ब्लोग्स को ढूंढकर पढ़ने में समय का पता ही नहीं चला, वहीं दूसरी ओर अपने पहले ही लेख पर मिली इतनी ढ़ेर सारी टिप्पणियों को देखकर हौसला आसमान छूने लगा। कई नए मित्रों तथा शुभचिंतकों से परिचय बना, कई महानुभावों का आशीर्वाद प्राप्त हुआ, सभी को धन्यवाद लगा कि वाकई में हिन्दी में ब्लॉग लिखने का फैसला सही था, बस आपकी सहमति कि मुहर चाहिए थी सो मिल गयी। अब मुझे कौन रोक सकता था। इसी बीच मेरा नया नामकरण हुआ। अपने कार्यस्थल (ऑफिस) पर मित्रों एवं सहकर्मियों द्वारा "हमसफ़र यादों का" के नाम से बुलाया जाने लगा। सुनकर बहुत ख़ुशी हुई। तभी गुरुवार को मतदान का एक और चरण संपन्न हो गया।

अगला दिन यानी शुक्रवार का रहा "मजदूर दिवस" के नाम (हम सब जानते हैं कि हर साल १ मई का दिन "मजदूर दिवस"/"श्रम दिवस"/"मई दिवस"/"लेबर डे" के नाम से मनाया जाता है)। सबसे पहले तो अपने कार्यस्थल पर सभी सहकर्मियों को मजदूर दिवस की बधाईयाँ दीं। कुछ ने ख़ुशी से कुबूल की तो कुछ ने अजीब से चेहरे बनाकर कहते हुए कि भाई हम ही मिले थे "मजदूर दिवस" की शुभकामनायें देने के लिए !! अब सवाल यह उठता है आखिर मजदूर कौन?? सड़क पर पत्थर तोड़ता हुआ आदमी या बोझा ढोने वाला कूली, रिक्शा चलाने वाला या सड़कों पर रेहड़ी लगाने वाला। ऐसे अनेकों उदाहरण हो सकते हैं मजदूरों के जो हमारे समाज ने परिभाषित किये हैं। परन्तु वास्तव में हम सब मजदूर हैं चाहे हम कितने भी ऊँचे पद पर हों या हमारा सामाजिक स्तर कितना ही अच्छा क्यों हो। हमारा समाज जबकि एक मजदूर को हीन भावना से देखता है कोई भी अपने आप को मजदूर कहलाना पसंद नहीं करेगा लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं कि यह समाज मजदूरों के बल पर ही टिका है। आप उपरोक्त उदाहरणों से ही अंदाजा लगा सकते हैं कि समाज की क्या दशा होगी इन सबके बगैर।

हम सब मजदूर कैसे हैं?? तो बताना चाहूंगा कि ऊपर "मजदूर दिवस" के लिए एक और शब्द प्रयुक्त हुआ है : "श्रम दिवस" और सही मायनों में हमारा मजदूर होना यही शब्द साबित करता है। "श्रम दिवस" उन सभी लोगों का दिवस है जो किसी न किसी रूप में श्रम, परिश्रम या मेहनत करते हैं। हर कोई किसी न किसी रूप में श्रम अवश्य करता है और जो नहीं करते वो आलसी, निकम्मा, बेकार, निठल्ला, अनाज के दुश्मन आदि-आदि कई उपनामों से जाने जाते है। अब बताइए हुए न हम सभी श्रमिक यानी मजदूर या फिर आप उन लोगों में से हैं जो श्रम नहीं करते। सोच लीजिये पसंद आपकी है कि आप श्रमिक यानी मजदूर कहलाना पसंद करेंगे या फिर.......

अंत में इन पंक्तियों के साथ अपनी वाणी को विराम देता हूँ (हम सभी श्रमिकों के नाम)
कुछ भी बनो तुम,
पर श्रमिक की अपनी पहचान खोना।
तुम श्रमिक महान,
तुम्हारी मेहनत से मिट्टी भी सोना।।

शेष फ़िर!!!


10 टिप्पणियाँ
श्यामल सुमन ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति साथ में निरन्तर आगे बढ़ने की मेरी शुभकामना।

कहा आपने ठीक ही हम सब हैं मजदूर।
स्वेच्छा से कोई नहीं रोटी से मजबूर।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

अफ़लातून ने कहा…

बहुत अच्छी पोस्ट । नियमित लिखते रहें । बधाई ।

Anil Pusadkar ने कहा…

बहुत बढिया।बधाई।

Udan Tashtari ने कहा…

एक उम्दा पोस्ट..अनेक शुभकामनाऐं.

Kapil ने कहा…

ब्‍लॉग पर आगमन की बधाई। शुरुआती पोस्‍टों से ही शुभ संकेत मिल रहे हैं। सार्थक और सामाजिक सरोकारों के लेखन की लंबी यात्रा हो, इन्‍हीं शुभकामनाओं के साथ...

Chandan Kumar Jha ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा है आप ने.आभार.

गुलमोहर का फूल

rani kumari ने कहा…

very nice post.........
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Daisy ने कहा…

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